संस्थापक का परिचय
दिव्य चेतना सत्संग के संस्थापक ब्रह्मलीन परमहंस स्वामीननन्द जी महाराज हैं। आपका अवतरण तिथि 29 अक्टूबर 1943 ई. एवं निर्वाण तिथि 4 जनवरी 2020 ई. है। आपके पिता का नाम स्व. जटाधारी सिंह एवं दादाजी का नाम स्व. रामसुभग सिंह तथा आपके एकल भ्राता का नाम स्व. राजमंगल सिंह है। आपका जन्म ग्राम- सुजानपुर, पोस्ट-भानपुर, थाना-दिनारा, जिला-रोहतास के एक सम्पन्न उज्जैन राजपूत वंश में हुआ। आप शुरु से ही न्यायी व्यक्तित्व के धनी रहे। आप सुंदर वस्त्र पहनने, घुड़सवारी करने, वेटलिफ्टिंग, डिस्कसथ्रो एवं तैराकी के शौकीन रहे। आप सी.सी.एल. (सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड) में माइनिंग इंजीनियर के रुप में कार्यरत रहे। आपने श्री रामस्नेही शुक्ल जी को अपने आध्यात्मिक गुरु के रुप में 16 वर्ष की अवस्था में ही वरण कर लिया था और गुरु के निर्देशानुसार आध्यात्मिक पथ पर चल पड़े। आपका मानना था कि अपने चेतना विकास के लिए घर परिवार को छोड़कर जंगल भागने की जरुरत नहीं है। आपने सिद्ध किया कि अपनी गृहस्थी में रहते हुए, सारे जिम्मेवारियों को निभाते हुए भी चेतना का विकास किया जा सकता है। आप सदा इसी के पक्षधर रहे। नौकरी के दौरान चेतना विकास की यात्रा चलती रही। आपने अपने नौकरी से सन् 2003 ई. में अवकाश प्राप्त किया। अवकाश प्राप्ति के बाद आध्यात्मिक यात्रा में आपकी सक्रियता और बढ़ गई। 30 सितंबर 2010 संध्या 4:30 बजे आपके अंदर में इच्छा हुई कि आपको अपना शरीर छोड़ देना चाहिए। आप सोच रहे थे कि आगे की जिमवारियाँ आपकी नहीं हैं। जैसे ही आपने ऐसा सोचा आपके अंदर में एक क्रिया घटित होनी शुरु हो गई। आपके अंदर दिव्य चेतना का अवतरण होना शुरु हो गया। यह दिव्यता विशाल होती जा रही थी। आपका सब कुछ शुन्य होता जा रहा था लेकिन फिर भी आप पूर्ण होश-हवास में थे। आप सारी अनुभूतियों को महसूस कर रहे थे। आप अपने आपको दिव्य चेतना के विशाल परिधि में खड़ा अनुभव कर रहे थे जहाँ शांति ही नहीं बल्कि परम शांति का साम्राज्य चारों तरफ फैला हुआ था। यह क्रम संध्या 6:30 बजे से शुरू हुआ और दूसरे दिन 1.30 तक चलता रहा। 03/10 सन् 2010 को रात्रि 10:00 बजे आपके अंदर में परम दिव्य चेतना का अवतरण हुआ। यह ऐसी चेतना थी जिसमें करोडो सूर्य विलीन हो रहे थे। इसका संदेश था नए प्रतिनिधियों द्वारा सत्संग का निर्माण तथा दिव्य चेतना का जागरण। 2 अप्रैल 2011 को आपके अंदर में दीक्षा प्रणाली का जन्म हुआ। अब आप जब भी किसी व्यक्ति को दीक्षा देकर अपने आप से जोड़ते वह व्यक्ति झूम उठता और कहता आपने बहुत पहले यह क्यों नहीं दिया। ऐसा इसलिए होता था कि आप अपने सत्य को जान चुके थे। अब आप एक स्वतंत्र आश्रय की खोज में लग गए और इसी क्रम में दिव्य चेतना सत्संग की स्थापना हुई तथा नन्द आश्रम का निर्माण हुआ।
सत्संग परिचय:-
1.सत्संग परिचय:-
दिव्य चेतना सत्संग के संस्थापक एवं संचालक परमहंस स्वामीनन्द जी महाराज हैं। दिव्य चेतना एक ईश्वरीय प्रेरणा है। इसका चयन एक ईश्वरीय आदेश के तहत हुआ है । हमारे अन्दर एक दिव्य चेतन सत्ता कार्य कर रही है । इसकी दिव्यता से हर वस्तु दिव्य हो जाती है। दुःख भी दिव्य होकर सुख और आनन्द में बदलने लगता है। इसकी जागृति हर मानव के लिए आवश्यक है। यही हमारा लक्ष्य है।
2.यह सत्संग एक गुरु प्रधान सत्संग है।
3. सत्संग का उद्देश्य:-
नैतिक उत्थान और मानव धर्म का प्रचार
4. सत्संग की उपलब्धि:-
निर्भीकता, क्षमा, दया, करुणा जैसे ईश्वरीय गुण का अवतरित होना।
5. यह सत्संग घर परिवार को छोड़कर भागने का संदेश नहीं देता। यह सत्संग अपने गृहस्थी में रहते हुए सारे जिम्मेवारियों को निभाते हुए अपने चेतना का विकास करने का संदेश देता है।
6. इस सत्संग का कोई अपना फंड नहीं है। सत्संग आयोजन के लिए किसी प्रकार का रसीद काटना या चंदा इकट्ठा करना मना है। अगर कोई स्वेच्छा से सहयोग देना चाहता है तो उसे स्वीकार भी किया जाता है।